Champak, Certified

On August 20, 2015 by admin

bbbb

Shubham Shree

 

Comrade I

 

right through the evening, samosas wolfed

pakoras, bread rolls gobbled

a million cups of tea guzzled

marking time for those mess bells

at the age of 28, measuring the mirror

those piercing eyes.

 

a few grey hairs, ailing father and some relatives

mother’s absurd clamour for a studio-photograph

home

a door bolted.

 

in my eyes

you smiled

a fist stretched

a fiery slogan

a poster, off-colour, on the wall

a kurta trailing thread

chappal-straps unpinning

polycystic ovarian syndrome.

quietly you are that too.

 

life unspools, thus

dreaming politbureau

chores for the mahila-morcha

hawking manifestos at seminars

or out on streets, baton-beaten

some days in remand

making it to the newspapers

but in the room, the pillow that remains drenched

malodorous

where do I report that, comrade?

aaa

***

Comrade II

 

that pole 20 centimetres by the tape and his body

are matched evenly

at 30, a loosely hanging shirt, remnant of the early nineties

and the denim, a gift from the archaeology department

even after the last drag on the circulating cigarette

if that parantha remains elusive

then a fit of laughter is fine.

MA second division whole-timer

used to be a mental patient

until last month

his party membership an inheritance from a dead father

chuckling, nonchalant

this comrade,

knows all about the world

but not about his home inundated by last night’s flood.

for a fortnight, his cellphone balance =zero!

bb

***

About That Boy


with three days of stubble

every guy looks hot

(that is what I believe)

and if, instead of the gym,

for a week he is hospital interned

then his eyes turn philosophic

yellow and melancholic

burning and lifeless

unsalted laughter, shriveled smile

walking but to tire

on a fulsome evening, shawl-wrapped—looking at infinity

eating once, puking thrice

crouched in syringe-fear.

running her palm over the wistful face of that boy

the girl thinks deep within,

let me die but nothing should happen to him

ailing boys become suspicious of their lovers

they cannot read minds—these ailing boys.

h

***

Women


they were to pick-up Asia’s patience

Africa’s endurance

Europe’s sense of fashion

American glitziness

but they lost their bearings

they gleaned love from Asia

philosophy from Europe

Africa gave them uprightness

America, revolt

they lost all the competence of a good wife

and ended up as blemished lovers too.

cc
***

Till Language Gives Us Words

my mind will brace me

countless dreams I will dream

squeezing my native power

to the final drop

I will love you.

whatever the yoke,

as long as language lives

there is complete freedom

bb

***

Love

the Ganga’s

the sun’s

the harvest’s

the flowers’

my dialect’s

and

your

enchantment will not wane

however life goes

till the scent of your bosom lingers on my tongue

the heart will not break.

dd

***

Rubber-Band on Socks

Golu of class I,

early-morning lone and shy

tiptoes tothe monitor of the second grade

and submits:

“Please, will you give me that rubber-band

from your plait?”

“Sir will spank.”

“Please, give, na?

Sir will not thrash girls, really he won’t,

My socks, they are slipsliding away.”

ee
***


Elegy Written for the Champaks


Lout I was, lout I am, lout I will be

whether I say it or not

it will be plain from my face

wily, oily, roily if you say so sure

shall flash all thirty-two and endure

not of this world, custom made, bonafide

shall still study Hindi. Champak, certified.

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कॉमरेड  I

पूरी शाम समोसों पर टूटे लोग
दबाए पकौड़े, ब्रेड रोल
गटकी चाय पर चाय
और तुमने किया मेस की घण्टी का इन्तज़ार
अट्ठाइस की उम्र में आईना देखती
सूजी हुई आँखें
कुछ सफ़ेद बाल, बीमार पिता और रिश्ते
स्टूडियो की तस्वीर के लिए माँ का पाग़लपन
घर
एक बन्द दरवाज़ा

हमारी आँखों में
तुम हँसी हो
एक तनी हुई मुट्ठी
एक जोशीला नारा
एक पोस्टर बदरंग दीवार पर
एक सिलाई उधड़ा कुर्ता
चप्पल के खुले हुए फीते की कील
पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिण्ड्रोम
भी हो तुम चुपके से
___
यूँ ही गुज़रती है ज़िन्दगी
पोलित-ब्यूरो का सपना
महिला-मोर्चे का काम
सेमिनारों में मेनिफ़ेस्टो बेचते
या लाठियाँ खाते सड़कों पर
रिमाण्ड में कभी-कभी
अख़बारों में छपते
पर जो तकिया गीला रह जाता है कमरे में
बदबू भरा
उसे कहाँ दर्ज करें कॉमरेड ?

***

कॉमरेड  II

टेप से नापकर 20 सेण्टीमीटर का पोल और उसका शरीर
बराबर हैं
तिस पर एक झलंगी शर्ट 90 के शुरूआती दिनों की
और जींस पुरातत्व-विभाग का तोहफ़ा
पैंचे की सिगरेट के आख़िरी कश के बाद भी
पराठे का जुगाड़ नहीं
तो ठहाके ही सही
सेकेण्ड डिवीजन एम० ए० होल-टाइमर
मानसिक रोगी हुआ करता था
पिछले महीने तक
दिवंगत पिता से विरासत में पार्टी की सदस्यता लेकर
निफ़िक्र खिलखिलाता
ये कॉमरेड
दुनिया की ख़बर है इसे
सिवाय इसके कि
रात बाढ़ आ गई है घर में
पन्द्रह दिनों से बैलेन्स ज़ीरो है !

***

उस लड़के की याद 

तीन दिन की शेव में
हर लड़का हॉट लगता है
(ऐसा मेरा मानना है)
और जिम के बदले
अस्पताल में पड़ा हो हफ़्ते भर
तो आँखें दार्शनिक हो जाती हैं
पीली और उदास
जलती हुई और निस्तेज
बिना नमक की हँसी और सूखी मुस्कुराहटें
चले तो थक जाए
भरी शाम शॉल ओढ़ कर शून्य में ताके
एक बार खाए, तीन बार उल्टी करे
दुबक जाए इंजेक्शन के डर से
उस लड़के के उदास चेहरे पर हाथ फेरती लड़की
मन ही मन सोचती है
मैं मर जाऊँ पर इसे कुछ न हो
बीमार लड़के प्रेमिकाओं पर शक करने लगते हैं
मन नहीं पढ़ पाते बीमार लड़के

***

औरतें

उन्हें एशिया का धैर्य लेना था
अफ़्रीका की सहनशीलता
यूरोप का फ़ैशन
अमेरिका का आडम्बर
लेकिन वे दिशाहीन हो गईं
उन्होंने एशिया से प्रेम लिया
यूरोप से दर्शन
अफ़्रीका से दृढ़ता ली
अमेरिका से विद्रोह
खो दी अच्छी पत्नियों की योग्यता
बुरी प्रेमिकाएँ कहलाईं वे आख़िरकार

***

जब तक भाषा देती रहेगी शब्द 

साथ देगा मन
असंख्य कल्पनाएँ करूँगी
अपनी क्षमता को
आख़िरी बून्द तक निचोड़ कर
प्यार करूँगी तुमसे
कोई भी बन्धन हो
भाषा है जब तक
पूरी आज़ादी है

***

प्यार 

गंगा का
सूरज का
फ़सलों का
फूलों का
बोलियों का अपनी
और
तुम्हारा
मोह नहीं छूटेगा
जैसा भी हो जीवन
जब तक रहेगी गन्ध तुम्हारे सीने की जेहन में
मन नहीं टूटेगा ।

***

मोज़े में रबर 

वन क्लास के गोलू सेकेण्ड ने
क्लास की मॉनीटर से
सुबह-सुबह अकेले में
शर्माते हुए
प्रस्ताव रखा —
अपनी चोटी का रबर दोगी खोल कर?
‘सर मारेंगे’
‘दे दो ना
सर लड़की को नहीं मारेंगे
मेरा मोजा ससर रहा है !’

***

चंपकों का प्रयाण गीत

 

चिरकुट था चिरकुट हूं चिरकुट रहूंगा

बोलूं चाहे न बोलूं

शकल से दिखूंगा

चेप कहे, चाट कहे, चंट कहे कोई

बत्तीसी निकाले हंस हंस सहूंगा

धरती का जीव नहीं ऑर्डर पर आया हूं

हिंदी पढ़ूंगा चंपक बनूंगा
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